पितर दशरूपकम्
जीवन लक्ष्य की ओर ले जाने वाले कार्य तथा कार्य संधियां अधिकारिक हैं। लम्बी दूरी तक समानान्तर चलनेवाले कार्य पताका हैं तथा कम दूरी तक समानान्तर चलनेवाले कार्य प्रकरी हैं। जीवन में दशरूपकम् समझ आवश्यक है। अधिकारिक, पताका, प्रकरी विवेक त्रि विवेक है।
अधिकारिक में चार आयु विभाजन हैं, चार कर्म हैं, चार पुरुषार्थ हैं, ऋतुएं हैं, दिन, रात, मुहूर्त, प्रहर, निमेष हैं। इन पर अधिकार रखना आवश्यक है। शतवर्ष 36500 दिन आदर्श नियत हैं अधिकारिक के लम्बाई के। इतनी दिवस संधियां हैं। इन दिवस संधियों में 755365 पंच यज्ञ संधियां हैं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की। इसी में सोलह संस्कार उम्र संधियां हैं 25365 दिनों की अबोध की। प्रतिदिवसीय संधियों में प्रतिवार सूर्य स्वर, चन्द्र स्वर परिवर्तन की संधियां हैं। सूर्य स्थिति परिवर्तन से ऋतु परिवर्तन की संधियां हैं। इन अधिकारिक संधियों को जीवन में साधना व्यावहारिक रूप में जीवनानन्द की एक आवश्यकता है।
माता, पिता, भाई, बहन, दोस्त, चाचा, चाची, दादा, दादी, मामा, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी, जीजा, भाभी, पति, पत्नी, बहू, दामाद, सास, ससुर, गुरु, शिष्य, आदि रिष्ते तथा तत्सम्बन्धि कर्म पताकाएं हैं जो जीवन में अधिकारिक से आरम्भ होकर समानान्तर चलती हैं। इनमें विभिन्न वर्ष दूरियां होती हैं। पति पत्नी पताका अधिकतम उम्र पचास वर्ष निर्धारित है। नौकरी तथा नौकरी सम्बन्धि वितान तो मात्र प्रकरी है। पद व्यवस्था, स्थानान्तर- संस्थान परिवर्तन आदि आदि की प्रकरियों का इसमें अवधि समावेश है। और प्रमोशन प्रकरी के प्रकरी है। ये सब प्रकरी संधियां हैं।
मानव की अक्षमता के स्तर, मानसिक तनाव का कारण नौकरी की प्रकरी का अधिकारिक से अधिक महत्वपूर्ण हो जाना है। आज जिन्दगी में छोटे से छोटे पद पर बड़े बड़े आदमी मिलते हैं और बड़े से बड़े पद पर छोटे छोटे आदमी मिलते हैं। प्रकरी, पताका, अधिकारिक त्रिविवेक आदमी को जीवन युजित करता है। और ऐसा आदमी बड़ा आदमी होता है।
डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
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