Wednesday, November 24, 2010

अवसर प्रबन्धन

साक्षात्कार, परीक्षा, चुनौतिपूर्ण कार्य, अतिश्रेयस्कर कार्य मानव के लिए रुके नहीं रहते। तुम नहीं करोगे किसी और के माथे सफलता का टीका लग जाएगा। अवसर पीछे से गंजा होता है। निकल जाने पर पीछे से पकड़ नहीं सकते। अवसर रेतवत मुट्ठी से फिसल जाता है।
        का बरखा जब कृषि सुखानी,
        मन पछतै हे अवसर बीते,
        सब कुछ लुटा के होष में आए तो क्या किया?
        दिन में अगर चिराग जलाए तो क्या किया?
    अवसर प्रबन्धन के ही उपरोक्त सारे तथ्य हैं। नवीन अवसर गुर है अवसर न होने पर अवसर पैदा करो।
    भारतीय संस्कृति या सांस्कृतिक तकनीक अवधारणा उपरोक्त धारणाओं के साथ जीवन को ही अवसर मानती है। मानव जन्म ही उत्थान का महा अवसर है। आरोह इमं सुखं रथम्- सुख पूर्वक षरीर का आरोहण करो, मानव चोला दुर्लभ रे बन्दे, वृथा जन्म गंवायो, अतिदुर्लभ मानव तन पाए, झीनी रे बीनी चदरिया, आदि मानव जीवन को अवसर दर्षाते हैं।
    भरथरी की नजर में युवावस्था स्वास्थ्य स्वस्थ षरीर ही एक महान अवसर है। इस अवसर को खोना नहीं चाहिए। यदि घर को आग लग गई है और उस समय कोई कूप खनन का अतिश्रम करता है तो उसका क्या लाभ? भरथरी का यह सन्देष महान अवसर प्रबन्धन सन्देष है।
    सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृषः। अवसर को पकड़ने के लिए पूर्व तैयारी आवष्यक है। भरथरी के अनुसार संभावनाओं का ध्यान रखते हुए अवसर प्रबन्धन करना चाहिए। संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन का पूर्वाधार है। परियोजना प्रबन्धन की आत्मा संभावना प्रबन्धन को छोड़ देने के कारण कई कई परियोजनाएं पूर्णता के पथ से वर्षों दूर भटक गईं हैं।
    मानव लक्ष्य है आत्म कल्याण। आत्म कल्याण प्राप्त होता है पुरुषार्थ से। पुरुषार्थ का आधार तथ्य है उत्तम स्वास्थ्य। उत्तम स्वास्थ्य का सम्बन्ध है उम्र तथा इन्द्रियों से। भरथरी कहता है-
    जब तक ओजपूर्ण, स्वस्थ है यह षरीर और जरा दूर है, बुढापा दूर है, और इन्द्रियां हैं षक्ति आभर, और भरा हुआ है आयुष- आयु के प्रति उछाह, आयु के प्रति उत्साह, तथा क्षय ने नहीं घेरा है आयु को, तब तक मानव को जो बुद्धि भरा है आत्मकल्याण के लिए महान पुरुषार्थ कर लेना चाहिए। तन की अगर व्युत्पत्ति सामान्य भाषा में की जाए तो त $ न बनती है। अर्थात तब नहीं है जो वही है तन। अर्थात अब स्वस्थ है जो वह है तन। अब जब यह है स्वस्थ तो है अवसर तो कर ले इसका श्रेष्ठ उपयोग, पाले इससे आत्मकल्याण, यह भरथरी अवसर प्रबन्धन है।
    मेरा परिवार कमायु (कम आयु) रहा है। मेरे भतीजे की मृत्यु सत्ताइस वर्ष में हृदयाघात से, मेरे चचेरे भाइयों की मृत्यु 36 वर्ष और 52 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से, मेरे छोटे मामा की मृत्यु 52 वर्ष में पक्षाघात से, मेरे बडे मामा की मृत्यु 58 वर्ष में, मेरे माताजी की मृत्यु 56 वर्ष में (50 वर्ष में पक्षाघात एवं कैंसर पष्चात) हुई। मेरे पिताजी की मृत्यु 60 वर्ष में तथा भैया की मृत्यु भी साठ वर्ष में ही हुई। अर्थात मेरे परिवार की औसत आयु पचास वर्ष रही है। आज मैं करीब 62 वर्ष का हंू। लिखित उम्र 59 वर्ष है जो गलत है। मैं आज से सात-आठ वर्ष पूर्व ही सावधान हो गया था तथा अध्यात्म क्षेत्र मैंने द्रुत कार्य आरम्भ कर दिया था। उम्र सूत्र देखते ही गरीब बस्तियों में बच्चों के खेल रखने और लिखने के उद्देष्य से मैंने नौकरी से सेवानिवृत्ति ले ली है। फिर भी मुझे विलम्ब हो गया। काष मैंने भरथरी का संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन सूत्र पहले पढ़ा होता।
    अब है यह ‘तन’ और तब न होगा। यह कब न होगा कोई न है जानता। तो करो न अब जब है तन आत्म कल्याणार्थ या लक्ष्यप्राप्ति अर्थ अत्यन्त प्रयास। अव्यक्त है बीता कल अव्यक्त है आनेवाला कल। व्यक्त है अब अतः इसमें सतत प्रयत्न है भरथरी अवसर प्रबन्धन।
    यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरादूरतो।
    यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
    आत्मश्रेयसितावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्।
    सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृषः।।
भरथरी अवसर प्रबन्धन- ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

अभय प्रबन्धन

    दिवस रात्रि, सूर्य चाँद, धरा आकाष, कल आज न भय करते हैं न नष्ट होते हैं। हे मेरे प्राण चन्द्रस्वर सूर्यस्वर और चन्द्रसूर्य स्वर तुम भी अभय रहो और सतत कर्म करो।
    सर्व मित्र हैं हम, न हमें भय है ज्ञात से, न हमें भय है अज्ञात से, न हमें भय है प्रत्यक्ष से, न हमें भय है अप्रत्यक्ष से कि दिशाएँ ही हैं मित्र हमारी।
जहां-जहां है तू परमात्मा हर छोर से भी आगे है रे तू परमात्मा। तुझमें हूँ यह मैं समीप अतः कल्याणमय पशु पक्षी मनुष्य अभय हूँ मैं यह।
    यह वेद अभय प्रबन्धन है। वर्तमान विष्व प्रबन्धन लाठी और लालच युक्त ‘ला’ ‘ला’ प्रबन्धन होकर रह गया है। लाठीभय से मुक्त करने के अथक प्रयास हो रहे हैं। पर कोई भी प्रबन्धन विधा इससे मुक्त नहीं हो पाई है। अमेरिका ब्रिटेन के लोग अनुशासन उल्लंघन दण्ड भय से कार्य करते हैं। ”काप“ पोलीस मैन द्रुत सवार करीब करीब हर स्थल मौजूद अमेरिकन बाह्य प्रबन्धन भय का आधार है। कम्प्यूटर चैतन्य से अधिक ऋत (प्राकृतिक नियमबद्ध) मषीन नियन्ता है ऑफिस प्रबन्धन की। दयानन्द कहते हैं जड़ की पूजा करनेवाले की बुद्धि जड़ हो जाती है। जड़ से नियन्त्रित की बुद्धि भी जड़ाधिक होगी ही। अमेरिका शृत-नियम-ह्रास ख्यात है। वासना- वास + ना अर्थात गृहपत्नी सहवास ना में परम दक्ष है। प्रमाण करीब-करीब सारे राष्ट्रपति हैं। लाला प्रबन्धन वित्त प्रबन्धन का भी नाम है। यह लालच प्रबन्धन है। 
    विश्व को वेद अभय प्रबन्धन की आवश्यकता है। यदि किसी भी संस्थान नैसर्गिक रूप में वेद अभय प्रबन्धन लागू कर दिया जाता है तो वह संस्थान विष्व श्रेष्ठ उत्पादकता देगा ही।
    मेरा जीवन सूत्र रहा है मानवता देवी, ज्ञान भाई, मेहनत बहना, सत्य साथी, धरती मां, जय विश्व जीते रहना। मानवता ने मुझे दानवता अभय किया। ज्ञान ने हर परीक्षा चुनौति अभय किया। महनत ने आलस्य से अभय किया। सत्य ने अभय किया असत्य से। और जय विष्व भावना ने अभय किया क्षुद्रता, ईर्ष्या द्वेष से। प्रमोशन अभयता धमकी अभयता मेरे नौकरी के रीढ़ मापदण्ड रहे। तभी मैं इतना अधिक काम कर सका।  
    भरथरी का अभय प्रबन्धन पर बड़ा ही व्यापक चिन्तन है। वह एक ओर तो भय के व्यापक कारण देता है जो प्रबन्धन तत्व का तथा मानव तत्व का भी अवमूल्यन करते हैं तो दूसरी ओर वे व्यापक तत्व देता है जिससे मानव सकारात्मक हो भयमुक्त हो सकता है।
1) भोग-रोग-भय- भोगवादी संस्कृति का भरथरी रोगमयी होने की संभावना में कारण करता है। द्वन्द्व शमन भोग हैं। द्वन्द्व सहन तप है। तप स्व स्वास्थ्य संस्थान सशक्त करता है। सुविधाभोग स्व स्वास्थ्य संस्थान कमजोर करता है। प्रबन्धन तप तत्व आधारित होना चाहिए भोग तत्वाधारित नहीं। भोगाधारित प्रबन्धन शराबी अवस्था रिलैक्सिंग तक पतित होता है।
2) वंशवाद- आचारभ्रष्टता भय- च्युतिभय वंशवाद का असर है। पहचानवाद वह दीमक है जो संस्थान प्रबन्धन को खा जाती है। सुरक्षा विभाग में ही अपवाद छोड़ सारे के सारे लोगों ने अपने परिचित पहचानी ठेकेदारों के पास कार्य में लगा दिए। सर्वाधिक दुहरी मार तो एक श्री.आर ने प्रबन्धन को दी है। ठेकेदार के पैसों से श्री.आर अपने संबंधी को अपने काम के लिए अपने पास लगा लिया है। इस सीमावंश भ्रष्टता की कल्पना शायद भरथरी ने भी न की होगी। पूरी राजनीति वंशभ्रष्ट है।
3) धन राज भय- धराधारित प्रबन्धन में राज भय के परिणाम स्वरूप करमुक्त आय का वितण्डा प्रषासन को तहस-नहस कर डालता है।
4) मौन दीनता भय- मौन रहने से दीनता भय होता है या अज्ञान भय होता है। इस कारण से अज्ञानी साहित्य सभा अध्यक्ष या अज्ञानी प्रबन्धन सभा अध्यक्ष प्रायः साहित्य या प्रबन्धनों को भाषण-लातें मार देते हैं। साहित्य क्षेत्र इसी मौनता के दैन्य क्षेत्र से बचते कई अध्यक्ष दषरूपकम् या काव्यालंकार बिना पढ़े ही इनको लात मार चुके हैं।
5) बलिष्ठ षत्रु भय- प्रबन्धन में सीनियॉरिटी रौंदना हरेक को भला लगता है। सीनियर को जो प्रमोषन पात्र है हमेषा अपने से अधिक तत्काल जूनियर से भय रहता है। यह भय उम्र अनुभव समय उपाधि तीनों के ठोस आधार द्वारा समाप्त किया जा सकता है।
6) रूप भय- मेरे वरिष्ठ प्रभारी दक्ष इमानदार अभियन्ता श्री.जी.सी.राघवन का सामने का एक दांत टूट गया। उन्होंने दो तीन दिन में ही मुझसे तीस बार कहा मुझे चेहरा उन्नयन कराना है, दांत लगवाना है। मैंने जो उनका दांत टूटा था देखा भी नहीं था। 
7) शास्त्र को वाद भय- पारम्परिक विधि नियम शास्त्र को खा जाता है। अपवाद का सार्वजनीकरण कर दिया जाता है। शास्त्र को वाद से छोटा कर दिया जाता है। राजनैतिक टोपियों के विचार राक्षस संविधान खा जाते हैं। और संविधान धाराओं के सिंह संविधान उद्देषिका के मानव ऋजु को चीथ डालते हैं। यही षाó को वाद भय है। विस्तार खा न जाए सार को यही शास्त्र प्रबन्धन है।
8) गुणी को खल भय- मैं सेवामुक्त हुआ दूसरे दिन सामान लेने गया। वहां एक अधिकारी ने मेरा लगाया ताला तोड़ डाला था। अपना ताला लगा लिया था। अलमारी का ताला भी तोड डाला था। मेरे कहने पर कि तुम्हारे सामने सामान ले लूंगा वह तैयार न हुआ। मुझसे बोला तोड़ लो न ताला! मैंने कहा उसकी आवष्यकता पडी तो उपमहा प्रबन्धक तथा महा प्रबन्धक की उपस्थिति में तुड़वा लूँगा। उस अधिकारी ने प्रसारित करवा दिया कि वे (मैं) मेरी अनुपस्थिति में हथौडा ले ताला तोडने आए थे।
    खल को गुण सहन नहीं होता है। भारत में सारे पी.एच.डी. असन्दर्भित कार्य करते हैं।
9) शरीर को मृत्यु भय- दवाखाने, अस्पताल, डॉक्टर, हकीम, चिकित्सा पद्धतियों के प्रकार, सुरक्षा व्यवस्था के मंहगे प्रयोग शरीरा के मृत्यु भय के प्रबन्धन की व्यवस्थाएँ हैं। कर्मचारी मृत्यु दिवस दसवें दिन कार्य बन्द, कर्मचारी  रिश्तेदार मृत्यु, बॉस परिचित मृत्यु कार्य बन्द, यहां तक खिंचता है कि बॉस कुत्ता मृत्यु भी कई की छुट्टि का कारण बन जाता है। ये प्रबन्धन विक्षेप मृत्यु से उपजे हैं।
    उपरोक्त भयों से मुक्ति दिलानेवाले प्रबन्धन का नाम है वैराग्य प्रबन्धन। वैराग्य प्रबन्धन का अर्थ है एषणा, अनुज्ञा, जाति-त्याग प्रबन्धन। अर्थात् तटस्थ प्रबन्धन जो अभय प्रबन्धन भी है। यह अभय भयमुक्तावस्था का नाम है।
        भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं।
        मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयं।
        शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं। 
        सर्वं वस्तुभयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
    गुणयुक्त अभय प्रबन्धन का स्वरूप भी भरथरी देते हैं-
1) धैर्य पिता है- धैर्य पिता के समान जिसका पालक है। विषम परिस्थितियों में सहज रहने को, आपत्तियों में विवेक कायम रखने को धैर्य या धीरज कहते हैं। आपात्कालीन प्रबन्धन या दुर्घटना में आकस्मिक प्रबन्धन या मार्क ड्रिल व्यवस्था नियोजन की सफलता धैर्य पिता द्वारा पालित होने में ही या धैर्य की छत्रछाया में ही होती है। यह धैर्य अभयता है।
2) क्षमा जिसकी माता है- त्रुटि पर मातृवत सस्नेह दण्ड देना। दण्ड देकर मातृत्व की छाया से शिशु को आश्वस्त भी करना सहारा लेना ही क्षमा को मातावत मानना है। कुम्हारवत बाहर से चोट भीतर से सहारा क्षमा का मातृवत प्रयोग है। यह अभयता दाता भाव है।
3) दीर्घशान्ति पत्नी है- शान्ति का अर्थ है स्थैर्य एवं सन्तुलन। जीवन उतार चढ़ाव का नाम है। हर कार्य में उतार चढ़ाव होते ही हैं। जिन्होने हर कार्य में स्थैर्य एवं सन्तुलन भाव को पत्नीवत सहधर्मिणीवत अपना लिया है वह भी स्थैर्य और सन्तुलनमय हो जाएगा। स्थैर्य और सन्तुलन के दीर्घ सिद्धान्त हैं- अ) मशीनों की प्रति छै माह साफ सफाई तथा रखरखाव। ब) अतिचल मशीनों की प्रति माह साफ सफाई तथा रखरखाव। स) नियत उपयोग समय पश्चात मशीनों में सुधार रखरखाव के स्थान पर उन्हें स्थानापन्न परिवर्तित कर देना। यह समय 5, 7, 10 आदि वर्ष मषीनों की प्रकृति अनुसार तय किया जाता है। यह शान्ति अभयता है।
4) सत्य सदायी मित्र है- सत्य के दो प्रारूप हैं- 1) प्राकृतिक सत्य, 2) नैतिक सत्य। प्रकृतिक सत्यों को ऋत कहते हैं। इनके अनुरूप सोना, उठना, संध्या, यज्ञ, भोजन, कार्य करना ऋत को मित्र बना लेना है। यह ऋत अभयता है।
नैतिक सत्यों को शृत कहते हैं। ये आपसी व्यवहार के नियम हैं। रिष्ते नाते, परिचित अपरिचित, तिथित अतिथित, बॉस अधिनस्थ से व्यवहार में सामाजिक सांस्कृतिक तथा नौकरी नियम अनुपालन शृत है। इनको सदायी मित्र बना लेना शृत सदायी मित्रता है। यह शृत अभयता है।
नियत समय नियत काम हडबडी से बचाने के लिए समय प्रबन्धन है। हडबडी समय कमी भय से उत्पन्न भाव है। नियत व्यक्ति से नियत व्यवहार विक्षेप असंगत के भयों से मुक्त करता है। द्वय सम्मिश्र ही जीवन है।
सत्य सदायी मित्र है जिसका वह सदा ही अभय है।
5) दया बहन है- दया का नाम करुणा है। दया का अर्थ नैतिक नियम उल्लंघन नहीं है। कार्य नियम उल्लंघन नहीं है। फिल्म भुवन शोम का दया नियम बकवास नियम था। भुवन शोम दृढ़ शृत नियमबद्ध ऋत नियमबद्ध व्यक्ति थे। एक बार गांव गए। एक ग्राम्य युवती ने उनकी अति स्नेहिल ऋजु मदद की। यह ग्राम्य युवती भुवन शोम के अन्तर्गत कार्य करते भ्रष्टता आरोपी की मंगेतर या पत्नी थी। ग्राम्य युवती आग्रह या दया संवेदनावश भुवन शोम ने आरोपी को सुविधामय अवस्था कार्यालयीन अधिकारों अन्तर्गत दीं। दया का परिणाम अपराध आरोपी ने खुशी खुशी कहा अपनी मंगेतर से मैं आरोपमुक्त हो गया, बडी जगह पोस्टिंग इसका अर्थ बडी कमाई समझी!
मेरे ऑफिस बाबूलाल श्रमिक काम करता था। तीन दिन काम नहीं आया दस्तखत कर चला गया। उसका वास्तविक सच्चा कारण था। उसकी श्रीमतीजी की जचकी, वह शिशु पिता बन गया। मैंने मित्रों से चर्चा की मित्रों ने दया सिद्धान्त बताया- जाने दो गरीब है। मैंने उसे अनुपस्थित ही नहीं किया उसे चेतावनी पत्र भी दिया। और उसे अपने खाते से तीन दिन का वेतन भी दिया।
वह दया बहन किस काम की जो अशृत या अनृत को जन्म दे। मेरे दया पथ ने मुझे अभय किया। बाबूलाल को भी ऋत शृत पथिक किया।
6) मन संयम भाई है- संयम है धारणा ध्यान समाधि। अर्थात सामंजस्य की अतिउच्चावस्था। ये वास्तव में सच्चे भाई हैं। क्षमता, समकक्षता, सामीप्यता, आत्मीयता से सह सोचने की क्षमता धारणा ध्यान समाधि अवस्थाएं संयम ही प्राप्त कराते हैं।
संयम का भाई होना अर्थात सबसे समकक्ष सम सधा न्यायपूर्वक व्यवहार करना। मन संयमता सर्व से अभयता है।
7) ज्ञानामृत भोजन है-
सुबह दुहो और शाम दुहो, रात दुहो मध्याह्न दुहो।
ब्रह्म तो हरपल अमृत है, हरपल हर क्षण ज्ञान दुहो।
वेद तो प्रभु की तान है, हरपल नया विहान गढो।
ज्ञान यथार्थ अमृत है। ऐसे अमृत का जो भोजन करता है वह भी अमृत हो जाता है। उससे वेद के ज्ञान बीज अंकुरित स्फुरित होते हैं। वह वेद शब्दों में मननात धारा में बह बह जाता है। वह हरपल ब्रह्म को निकटतम पा ब्रह्म के निकटतम हो जाता है, भयमुक्त हो जाता है।
व्यवहार में वह ज्ञानामृत पीने के कारण षून्य त्रुटि हो जाता है। त्रुटि या विक्षेप रहित होना ही तो अभयता देता है।
8) दिशाएं वस्त्र हैं- प्राची, दक्षिणा, प्रतीची, उदीची, ध्रुवा, ऊर्ध्वा ओढ़ ली है जिसने वह आकाश ओढ लेता है। वह अदिति दिशामुक्त हो जाता है। दिशा दिशा अभयता प्राप्त कर लेता है। अदिति वस्त्रित हिरण्य हो जाता है। दितियां उसकी चेरी होती हैं।
9) भूमि शय्या है- भूमि की गोद की महक में सोना दिव्य सोना है। कच्ची भूमि की उठती मद्धिम महक आदर्श महक एकांक है। इस महक के किण्व (एन्झाइम) अतिसशक्त किण्व हैं। विज्ञान प्रकाशाधार की ओर बढते फोटॉन तक पहुंचा है। फोटॉन को नेत्रान स्थूल कह सकते हैं। नेत्रान सूक्ष्मतम स्तर रूप ब्रह्म है। इसी प्रकार रसान, स्पर्शान, शब्दान, गंधान सूक्ष्मतम रूप रसब्रह्म, स्पर्शब्रह्म, शब्दब्रह्म, तथा गन्धब्रह्म है।
भूमिमाता गतियों का अन्तरिक्ष झूलना है क्या दिव्य झूला है। वह योगिन जो इस कुटुम्ब के माध्यम से ब्रह्म युजित उन्मुक्त है। पल पल ब्रह्म युजित उन्मुक्त का नाम ही योगिन- सतत योगी है। यह योगिन भय उन्मुक्त अभय होगा ही।
अभय प्रबन्धन जहां वर्तमान युग में कमांडो घिरे बुलेटप्रुफी प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति, एम.पी. आदि हों वहां की सबसे बडी आवष्यकता है।
ब्रह्मलीन डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

Sunday, November 21, 2010

परियोजना प्रबन्धक

    औद्योगिक विश्व में कार्यात्मक दृष्टि से परियोजना प्रबन्धन अत्यन्त कठिन कार्य है। इस कार्य के लिए ही अधुनातन पर्ट विधि का विकास हुआ। पर्ट का हिन्दी नाम है कामूआत- ‘कार्य मूल्यांकन आकलन तकनीक’। कामूआत में दो महत्वपूर्ण तत्व हैं- एक अविलम्ब पथ, दो द्वितीयक पथ। इसके अतिरिक्त संधियां तथा विलम्ब की अवधारणाएं हैं। समानान्तर कार्य भी इसका एक अंग है।
    परियोजना की परिभाषा है एक जटिल महत कार्य जिसकी कसावटमयी समयबद्ध सीमा हो, जिसमें लागत लगनी हो, कई कई अन्तर्सम्बन्धित क्रियाएं हों तथा अदुहरावपूर्ण परिस्थितियों की चुनौतियां ही परियोजना है। अदुहरावपूर्ण परिस्थितियां तथा इन पर विजय का आह्लाद परियोजना का बोनस है।
    क्या उपयुक्त अधुनातन पर्ट या कामूआत विद्या वैदिक संस्कृति में है? इस प्रश्न का उत्तर है निश्चित ही है। धनंजय के दशरूपकम् ग्रन्थ में कथा के माध्यम से कार्य के तीन रूप- (1) प्रख्यात, (2) उत्पाद्य- कल्पनाजन्य, (3) मिश्र; तथा कार्य के तीन प्रवहण- 1. मुख्य, 2. प्रकरी, 1. पताका बनाए जाते हैं। इस प्रवहण में कुछ प्रवहण धर्म अर्थ काम त्रिवर्ग हैं, कुछ दो हैं, कुछ में केवल एक है। महत्ता के अनुसार कार्य विभाजन है। तथा इसकी पांच प्रकृतियां (बीज, बिन्दु, केतु, केतुका, कार्य), पांच अवस्थाएं (आरम्भ, यत्न, प्राप्ताशा, नियताप्ति, फलागम), पांच संधियां (मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, उपसंहृति) हैं इसके पश्चात प्रति प्रकृति, प्रति अवस्था, प्रति संधि बारह या तेरा और विभाजन हैं। यह वैदिक दर्शन आधारित व्यापक पर्ट है।
    परियोजना प्रबन्धक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है अनिश्चितता विजय या अदुहरावपूर्ण परिस्थितियों की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना। वेद में ऐसी विजय का महत्व सहज, सरल शब्दों में दर्शाया गया है। "लकीर के फकीरों नें नया कदम बढ़ाया, नया सूर्य गढ़ लिया।"
डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

पितर दशरूपकम्

पितर दशरूपकम् 
    जीवन लक्ष्य की ओर ले जाने वाले कार्य तथा कार्य संधियां अधिकारिक हैं। लम्बी दूरी तक समानान्तर चलनेवाले कार्य पताका हैं तथा कम दूरी तक समानान्तर चलनेवाले कार्य प्रकरी हैं। जीवन में दशरूपकम् समझ आवश्यक है। अधिकारिक, पताका, प्रकरी विवेक त्रि विवेक है। 
    अधिकारिक में चार आयु विभाजन हैं, चार कर्म हैं, चार पुरुषार्थ हैं, ऋतुएं हैं, दिन, रात, मुहूर्त, प्रहर, निमेष हैं। इन पर अधिकार रखना आवश्यक है। शतवर्ष 36500 दिन आदर्श नियत हैं अधिकारिक के लम्बाई के। इतनी दिवस संधियां हैं। इन दिवस संधियों में 755365 पंच यज्ञ संधियां हैं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की। इसी में सोलह संस्कार उम्र संधियां हैं 25365 दिनों की अबोध की। प्रतिदिवसीय संधियों में प्रतिवार सूर्य स्वर, चन्द्र स्वर परिवर्तन की संधियां हैं। सूर्य स्थिति परिवर्तन से ऋतु परिवर्तन की संधियां हैं। इन अधिकारिक संधियों को जीवन में साधना व्यावहारिक रूप में जीवनानन्द की एक आवश्यकता है।
    माता, पिता, भाई, बहन, दोस्त, चाचा, चाची, दादा, दादी, मामा, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी, जीजा, भाभी, पति, पत्नी, बहू, दामाद, सास, ससुर, गुरु, शिष्य, आदि रिष्ते तथा तत्सम्बन्धि कर्म पताकाएं हैं जो जीवन में अधिकारिक से आरम्भ होकर समानान्तर चलती हैं। इनमें विभिन्न वर्ष दूरियां होती हैं। पति पत्नी पताका अधिकतम उम्र पचास वर्ष निर्धारित है। नौकरी तथा नौकरी सम्बन्धि वितान तो मात्र प्रकरी है। पद व्यवस्था, स्थानान्तर- संस्थान परिवर्तन आदि आदि की प्रकरियों का इसमें अवधि समावेश है। और प्रमोशन प्रकरी के प्रकरी है। ये सब प्रकरी संधियां हैं। 
    मानव की अक्षमता के स्तर, मानसिक तनाव का कारण नौकरी की प्रकरी का अधिकारिक से अधिक महत्वपूर्ण हो जाना है। आज जिन्दगी में छोटे से छोटे पद पर बड़े बड़े आदमी मिलते हैं और बड़े से बड़े पद पर छोटे छोटे आदमी मिलते हैं। प्रकरी, पताका, अधिकारिक त्रिविवेक आदमी को जीवन युजित करता है। और ऐसा आदमी बड़ा आदमी होता है।
डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

Sunday, September 19, 2010

"पर्यावरण "

पर्यावरण
    विश्व में 66 प्रतिशत जनता भूखी एवं अपोषित है। औसत विकास एवं उत्थान के लिए खाद्य उर्जा जो आवश्यक है वह विश्व के दो तिहाई लोगों को उपलब्ध नहीं है। कम खाद्य उर्जा कम उत्पादकता को जन्म देती है। एक दुविधा चक्र है यह। डाक्टर मैक्सनीफ की दहलीज प्राकल्पना के अनुसार सीमांत या दहलीज सीमा के पार के एक तिहाई विश्व के लोग जिन्हें आवश्यकता से अधिक खाद्य ऊर्जा के साथ-साथ सम्पन्नता उपलब्ध है भी दुःखी है। यह दूसरा दुविधा चक्र है। एक ओर अभाव का दुःश्चक्र है दूसरी ओर आधिक्य का। यह विश्व विडम्बना है। जीवन सहाय व्यवस्था का द्वि असंतुलन एक गहन चिन्ता का विषय है।
द्विफांक संसार
    आज का संसार द्विफांक संसार है। एक फांक है विकसित विश्व, दूसरा अविकसित विश्व। डॉ. लीस्टर ब्राउन कहते हैं ”वास्तव में हमारा संसार दो संसार है एक धनिक एक निर्धन, एक शिक्षित एक बहुलांश अशिक्षित, एक औद्योगिक शहरी दूसरा कृषि परक ग्रामीण, एक अति भोजन प्राप्त एक भूखा, एक थुल-थुल लोगों का एक पिचके लोगों का, एक बहुल उपभोग आदि का दूसरा मात्र जीवित रहता, एक आर्थिक संभावनाओं भरा दूसरा आर्थिक विपन्नताओं भरा।
    दरिद्रता की कोई आर्थिक परिभाषा नहीं है। दरिद्रता एक स्थिति है जिस में एक बच्चा लालायित दृष्टि से स्कूल देखता है पर स्कूल जा नहीं सकता कि पैसे नहीं हैं या पिता माता की अनुपस्थिति में घर बच्चे देखने की मजबूरी है.. जिसमें बच्चा डबल रोटी, रोटी होटलों में भूखी नजरों से देखता है लेकिन खा नहीं पाता.. वह पत्तलों की जूठन खाने बाध्य है.. इस स्थिति में चाय की उबली पत्ति भी बेकार फैंकना परिवार को गवारा नहीं होता.. और कभी कभी वह भी खाद्य के रूप में प्रयुक्त होती है.. दरिद्रता वह है जिसमें पिता के सामने उसकी दरिद्रता के कारण पांच दिवसीय बच्चे को तकलीफ होने पर पेट छाती पर छत्तीस जगह गरम तपते हंसिए से दाग दिया जाता है तथा उसमें राख भी दी जाती है, घाव पक जाते हैं, कई बच्चे दम तोड़ देते हैं.. दरिद्रता यह है कि आठ फुट लम्बी चौड़ी झोपड़ी में बाप मां समेत चार बच्चे रहते हैं.. वही झोपडी उनका किचन, स्नान घर, ड्राइंग रुम, डायनिंग है..दरिद्रता वह कि झोपड़ियों के पास सड़ती नालियों से उठती बदबू, चूल्हों सिगड़ियों से उठता घना धुंआ, थोड़े से भी मैदानों के खुले शौचालयों की बदबू तथा किसी संभ्रांत के उधर आ जाने पर मैदानों में मानो गार्ड आनर देती महिलाएं खड़ी हो जाती हैं.. इस स्थिति में बच्चों के मुंहों में मां बाप की सस्ती गालियां भरी रहती हैं.. तथा विश्व की सर्वोत्तम गालियां आविष्कृत होती हैं.. लकवा, खाज, खुजली, टी.बी., मलेरिया, टाइफाइड, हैजे, एड्स आदि में जहां आधे मरते-जीते लोग रहते हैं वह गरीबी है।
    औद्योगीकीकरण क्रांति से पूर्व विश्व दो फांक नहीं था, यह एक था। उस समय औसतः सारे लोग समान रूप से कम निर्धन थे समान सुखी-दुःखी थे केवल कुछ अति संभ्रांतों को छोड़कर। औद्योगिक क्रांति के साथ विश्व में औद्योगिक विश्व बाकी विश्व अलग-अलग हुए और औद्योगिक विश्व की आय का अनुपात 2 : 1 से 10 : 1 से 15 : 1 से 30 : 1 क्रमशः वर्ष 1850, 1950, 1960, 1970 में हो गया। 1973 में अमेरिका मात्र औसत आयु अनुपात 50 : 1 थी। अमेरिका के विकास की दर करीब 5 प्रतिशत भारत के सम्पूर्ण वार्षिक निवेश के बराबर है। विश्व स्तरीय अमीरी गरीबी खाई क्रमशः अभिवृद्धि पर ही है। प्रदूषण की स्थिति का अनुपात विपरीत दिशा में है। प्रदूषण देश की सीमाएं नहीं मानता है। इराक में जलते तेल कुंए भारत पाकिस्तान तक को प्रभावित करते हैं। नेपाल में कटते जंगल भारत में वर्षा की कमी पैदा करते हैं। एक देश का सामुद्रिक प्रदूषण दूसरे देशों में विषाक्त मछलियों को पैदा करता है। नष्ट होते अंतरिक्ष यान/उपग्रह किसी भी देश में परमाणु कचरा बिखेर सकते हैं। बांध एवं महत भूमि कटावों से, परमाणु कचरे के गहरे कुंओं में विसर्जन से, प्रायोगिक परमाणु विस्फोटों
से, तेल कुंओं से, भूकंपों का संबंध आज जुड़ रहा है, ये सब भी महत प्राकृतिक प्रदूषण इस संदर्भ में कहे जा सकते हैं।
भूख और पर्यावरण
    कभी धरती असीमित थी, आज यह विश्व सीमित है। हमारी पहुंच सीमा के अंदर कुल एक गुना दस बटे अस्सी कणिकाएं मात्र इस विश्व में हैं। भूख निवृत्ति साधन और पर्यावरण विश्व की सीमितता के कारण सीधे संबंधित हैं। मानव इतिहास में उसका स्वरूप कृषि ने सर्वाधिक परिवर्तित किया है। मानव सामाजिक पर्यावरण और भोतिक पर्यावरण क्रमशः परिवर्तित हुआ हैं। "जंगल मानव" एक समूह था "कृषि-मानव" एक परिवार था और ”औद्योगिक मानव“ एक व्यक्ति है। आदि पर्यावरण एक स्वच्छ स्पष्ट साफ सुथरा आकाश था.. मध्य पर्यावरण एक देवता व्यवस्था था तथा औद्योगिक पर्यावरण एक धीमी जलती भट्टी है। सर्वांगणीय दृष्टि से मानव ने उन्नति की है या अवनति यह एक आधारभूत प्रश्न है।
    भूख निवृत्ति के लिए मानव ने पशु संसाधन चुने, धरा टुकड़े संसाधन चुने, जल संसाधन चुने, कीट संसाधन चुने (कीट नाशकों द्वारा), वनस्पति अनाज वृद्धि संसाधन चुने। इन सब संसाधनों का सीधा संबंध पर्यावरण से है। अस्थाई मौसमी अनाजों के लिए स्थाई जंगलों का विनाश आवश्यक है। दूरदर्शन के दिनांक 7/6/1992 के प्रातः प्रसारण के अनुसार वर्तमान में भी प्रति सेकन्ड एक एकड़ वन नष्ट हो रहे हैं।
    भूख-असंतुलन-अकालों ने सड़कों रेलों की द्रुत परिवहन की आवश्यकता दर्शाई.. जिससे इस्पात तथा परिवहन उद्योगों का विकास हुआ। स्वाद ने रेफ्रिजरेशन उद्योग को जन्म दिया। इन आधारभूत उद्योगों के आधार पर ही औद्योगिक क्रांति हुई जिसमें कोयला, पेट्रोल, गैसें, परमाणु ऊर्जा आदि प्रयुक्त हुए। औद्योगिक विकास क्षेत्रों को ओद्योगिक माल खपत क्षेत्र चाहिए थे अतः उपनिवेशवाद जन्मा.. परिणामतः युद्ध हुए.. युद्धों के लिए अस्त्रों का विकास हुआ.. भयावह सुरक्षा संधियां हुईं.. युद्धों द्वारा शांति प्रयास हुए.. नए कारखाने खुले... भारी युद्धक विमान बने.. युद्ध प्रौद्योगिकी ने मानव उत्थान में भी योगदान दिया.. आज प्रौद्योगिकी तथा अस्त्रों की दौड़ प्रथम हो गई है, मानव भूख पीछे छूट गई है। इस भयावह दौड़ ने मानव का भक्षण तो किया ही है (विश्व मानव 66 प्रतिशत भूखा, 70 प्रतिशत अनपढ़, करीब 65 प्रतिशत बेघर है) पर साथ ही पर्यावरण भक्षण भी किया। ‘मानव भूख’ मिटाने में जो भी सफल कदम इसने उठाए उससे भी पर्यावरण भक्षण हुआ। बाएं हाथ प्रगति दाएं हाथ अवगति इस विकास का स्वरूप रहा।
    धरा पर्यावरण विषयक कुछ भयावह तथ्य इस प्रकार हैं-
वर्तमान समस्या का स्वरूप
    आधुनिक संकीर्ण सीमित दृष्टि वैज्ञानिकों ने शिल्प यज्ञ के कल्याणमय स्वरूप से हटकर सीमित तारकासुर-दृष्टि वाला स्वयं सुखकर विज्ञान प्रतिपादित किया जिसके भयानक परिणाम मानव जाति को भोगने पड़ रहे हैं। क्योंकि मानव ने भी वैज्ञानिकों की तरह भारती, इड़ा, सरस्वती समन्वित दृष्टि खो दी है। धरा-पर्यावरण विषयक कुछ भयावह तथ्य ये हैं।
1. परमाणु बम विस्फोटों, 200 परमाणु केन्द्रों, रेफ्रिजरेशन, एअर कंडीशनिंग, जेट विमानों, उद्योगों के प्रदूषणों, वेल्डन कटनादि, पेंटिग की प्रक्रियाओं से 1984 से 200 किलोमीटर मोटी ओजोन परत में 5000 वर्ग मील का दक्षिण ध्रुव के ऊपर छिद्र हो गया है। परिणामतः विश्व मानव को दक्षिण ध्रुव बर्फ पिघलने से समुद्र तल उठने के तथा ओजोन परत के 15 प्रतिशत कमजोर होने से सूर्य से अनछनी पराबैंगनी किरणों के आने से रक्त क्षय, कैंसर आदि की बीमारियों के बढ़ने के खतरों का सामना करने की चिन्ता है- द्यौ अशांति है।
2. औद्योगिक मानव वर्तमान में अंतरिक्ष में करीब पांच लाख रासायनिक पदार्थ उत्सर्जित कर रहा है। ये सब अवशेष हैं। इसमें से कुछ विघटन द्वारा विनष्ट हो जाते हैं। लेकिन डी.डी.टी., पारद मिथाइल, प्लास्टिक आदि अविनष्ट रहते हैं- अंतरिक्ष अशांति है।
3. पिछले औद्योगिक अर्ध विकास के शतक में पर्यावरण में 36,000-40,000 करोड़ टन कार्बन द्वि ओषिद विसर्जित की गई। इसके अवशोषण कर्ता चालीस प्रतिशत वन नष्ट किए गए। आज विश्व में मात्र 14 प्रतिशत वन हैं। विश्व में आदर्शतः प्रातः प्रसारण दिनांक 7/6/1993 के अनुसार वर्तमान में प्रति सेकंड विश्व में एक एकड़ वन नष्ट हो रहे हैं- पृथ्वी अशांति है वनस्पतयः अशांति है।
4. 1986 में कैमरून में निकास नामक झील की तलहटी पर सदियों से एकत्र अतिरिक्त कार्बन द्वि ओषिद अचानक एक बादल की तरह हवा में फैल गई तथा हवा से भारी होने के कारण जमीन पर फैलती गई और 1700 लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। वर्तमान में कार्बन द्वि ओषिद संघनन खतरा अधिक है क्योंकि करीब 900 करोड़ टन कार्बन द्वि ओषिद प्रतिवर्ष वातायन में निष्कासित होती है। करीब 300 करोड़ टन पौधों द्वारा शोषित 300 करोड़ टन वातायन विस्तारित-विच्छेदित होती है तथा 300 करोड़ टन कहीं-कहीं जमा हो रही है तलहटियों तथा जल सतहों पर- पृथ्वी अशांति है, आपः अशांति है।
5. सन् 2000 तक ग्रीन हाउस इफेक्ट के कारण या कार्बन द्वि ओषिद के वातायानाधिक्य के कारण धरा मंडल का तापमान 40 फेरनहीट बढ़ जाएगा। परिणाम स्वरूप ध्रुव बर्फ पिघलने से समुद्र जल सतहों में वृद्धि से समुद्र तट की बंदरगाहों को भूमि तल की ओर और सिकुड़ना होगा- आपः अशांति है।
6. विश्व में पेट्रोल के आम उपभोग में प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत वृद्धि हो रही है, शुद्ध जल उपभोग में 3 प्रतिशत वृद्धि, समुद्री मांस की खपत में 4 प्रतिशत वृद्धि तथा रासायनिक खाद के उपयोग में 7 प्रतिशत वृद्धि हो रही है। विश्व में खाद्य पदार्थांे में 5 प्रतिशत वृद्धि के लिए न केवल 7 प्रतिशत रासायनिक खाद वरन् डी.डी.टी. डेलड्रिन तथा क्लोरीन के हाइड्रोकार्बन आदि जहरीले कीट नाशक भी लगते हैं और कृषि क्षेत्र के जल के साथ बहकर ये झीलों, तालाबों के पानी को जहरीला कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को औट्राफी कहा जाता है- अशांति आपः है।
7. लास एन्जल्स शहर में बच्चों का उत्साहपूर्वक थकान होने तक लंबी सांस खेलना मना है कि वे प्रदूषित वायु से बीमार न हों। जापानी पोलिस-मैन बीच-बीच में ओषजन बूध जाकर ओषजन लेते हैं। ब्रिटेन में शहरों में फेफडों की बीमारियों में गांवों की तुलना से दुगुनी मृत्युएं होती हैं। अमेरिका में शहरी लोगों को गांवों की तुलना में दुगुनी संख्या में फेफड़ों का कैंसर होता है। इसके अतिरिक्त वातायन में फैले पाए, सीसे, संखिया, कैडियम, एस्वट्स आदि के जहर मानव हेतु खतरनाक हैं। 1971 में अमेरिकी समुद्र में 87 प्रतिशत मछलियों में पारा खतरनाक स्तर तक था। 1970 न्यूयार्क में 2600 व्यक्ति सीसा जहरित थे। 5000 बच्चोें की खून में सीसाधिक्यता थी।
    स्पष्ट है कि पर्यावरण ह्रास हर किसी को समान रूप से दुष्प्रभाव करता है चाहे वह अमीर हो या गरीब, वृद्ध हो या बच्चा, नारी हो या पुरुष, काला हो या गोरा, विकासशील राष्ट्र का हो या विकसित राष्ट्र का, शिक्षित हो या अशिक्षित, संसारी हो गर्भस्थ।
    कृषि के आविष्कार ने कालांतर में कई आविष्कारों को जन्म दिया। वे हैं बांध, पशु प्रजाति चयन, कीट प्रजाति चयन, आंतरिक दहन इंजन, वनस्पति प्रजाति चयन, विभिन्न खादें, भूमि उन्नयनीकरण लवण, जैव अभियांत्रिकी परमाणु विकरण अत्र संरक्षण, कीट नाशक अत्र संरक्षण, बीजों का आमूल औषधीकरण, भूमि अनुरक्षण, कृत्रिम वर्षण, खाद्य-संरक्षण (बिस्कुट, तलना आदि) आदि। यदि आधुनिक कृषि का स्वरूप देखा जाए तो हम पाते हैं कि इसका बहुलांश नकारात्मक कृषि वृद्धि स्वरूप है तथा प्रदूषण युक्त है। हरित, श्वेत एवं समुद्र क्रांतियों के स्वरूप सीधे पर्यावरण से संबंधित हैं।
    अनुमान है कि शताब्दी के अंत तक वनस्पतियों तथा जीवों की 20 प्रतिशत प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी। हमें उपलब्ध खाद्य का 90 प्रतिशत मात्र 20 प्रजातियों से मिल जाता है। कुल पौधा-पेड़ प्रजातियां तकरीबन 3 करोड हैं। कुल वनस्पति का 25 प्रतिशत हिस्सा खाने योग्य है। पिछले तीन अरब वर्ष में जितनी प्रजातियों का उद्भव हुआ था उनका 50 प्रतिशत इस शताब्दी में समाप्त हो जाएगा (कादंबिनी मई 1986 पृष्ठ 65) रेडियम सक्रियता भी भूकम्प का कारण हो सकती है, क्योंकि रेडियम सक्रिय ऊर्जा जब मुक्त होती है तब वह पृथ्वी के अंदर की चट्टानों को पिघला देती है। (वही पृष्ठ 106) ये पिघली चट्टानें भूकम्पों का कारण होती हैं। 1948 में डॉ. पाल हर्मन मूलर स्विस वैज्ञानिक को डी.डी.टी. के आविष्कार के लिए नोबल पुरस्कार मिला था। दो दशक बाद डी.डी.टी. का प्रयोग विश्व के अधिकांश देशों ने प्रतिबंधित कर दिया। जहां यह प्रतिबंधित नहीं किया गया वहां भयावह पर्यावरणीय खतरा उठाना पड़ा।
    व्यापारिक मछली उत्पादन संस्थान में एक अमेरिकन क्षेत्र में नारवाल्ड फिमरेइट एक स्नातक छात्र ने एक मछली में सात गुना खतरनाक पारे की मात्रा पाई। कई व्यापारिक-मछली संस्थान बंद कर देने पड़े।
    परमाणु विकरण विधि से अनाज संरक्षण विद्या भी मानव हेतु दीर्घ काल में नुकसान देह रहने के कारण छोड़ दी गई। सारे खाद्य संरक्षक कम नुकसान देह के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
    हर प्राणी में (मनुष्य से अतिरिक्त) एक सहज खाद्य चयन प्रवृत्ति आरोपित रहती है अतः प्राणी से बचाने खाद्य को विषैला करना खाद्य को मनुष्य के लिए भी विषैला करना है यह एक सरल सा सत्य है।
    शपतथ ब्राह्मण के अनुसार विष सिंचित अनाज राक्षसी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। इस सूक्ष्म धारणा पर आज गहन चिन्तन की आवश्यकता है। पंजाब समस्या के संदर्भ में एक अंश चिन्तन इस पर हुआ है।
    कौन जानता है जैव विज्ञान द्वारा वृद्धि प्राप्त बडे आकार के खाद्य पदार्थ कल दूर भविष्य में मानव को क्या नुकसान कर दें।
    यह एक भयावह दुष्चक्र है। क्या इसका कोई हल है,? क्या इसका कोई इलाज है? क्या इसका कोई विकल्प है?
    हम पर्यावरण से आरंभ कर एक व्यापक चिन्तन करें।
"पर्यावरण-संतुलन"
आर्थिक औद्योगिक मनुष्य-तारकासुर
    प्राकृतिक पर्यावरण में एक स्वतः संतुलन व्यवस्था है। आज से सौ सवा सौ वर्ष पूर्व तक (औद्योगिक युग पूर्व में) मानव क्रियाओं से प्राकृतिक पर्यावरण में सीमित क्षेत्र में यह स्वतः संतुलन थोड़े समय के लिए बिगड़ता था तथा स्वंय ही ठीक हो जाता था। औद्योगिक युग के आरंभ के साथ ही जन्म हुआ आर्थिक औद्योगिक मनुष्य का। आर्थिक औद्योगिक मनुष्य मूलभूत रूप में स्वार्थी, सुविधाभोगी, छली, प्रगतिशील, हिरण्य नयन और चकाचौंध प्रिय है। इसने पर्यावरण भक्षण शुरू कर दिया।
    आर्थिक औद्योगिक मनुष्य का भान कालिदास को भी था। इसका वर्णन वे इस प्रकार करते हैं। इसके नगर सूर्य इतना ही तपता है जो इसकी बावलियों में कमल खिलाने के लिए पर्याप्त हो। इसके डर से वायु बगीचों में घूमना छोड़ इसके पास पंखे की हवा से अधिक नहीं बहता। छः ऋतुएं अपनी क्रमिक सेवा क्रम को छोड़कर एक साथ होकर पुष्पादि जुटाने में आसक्त होती उद्यान पालकों के समान इसकी सेवा करती हैं। जिन नन्दनवन के तरुपल्लवों को देवांगनाएं अपने हाथों से दया पूर्वक कोमलता से चुनती थीं उन्हें यह काट-काट कर गिरा रहा है। इसने सूर्य के अश्वों के खुरों से वचूर्णित सुमेरु पर्वत के शिखरों को उखाड़ कर अपने गृह में विहार पर्वत बना लिया हे। (कुमार संभव- 2/33/-23)
    आधुनिक आर्थिक औद्योगिक मानव का स्वरूप इससे अधिक ही है। इसके कमरे में धुंधलाए कांचों से छना सूर्य प्रकाश है जो गुलदस्ते में सजे फूलों पर पड़ता है.. कक्ष वातानुकूलित हैं.. वातानुकूलन छः ऋतुओं पर कब्जा करने के लिए है.. इसका कक्ष सागौन की सर्वोत्तम लकड़ी के कुर्सी टेबलों से तथा दीवार पैनलों से सजा है जो हरित पेड़ काट-काट कर बना है.. सूर्य गरमियों से उगे पौधे इसके कक्ष में गमलों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
    कालिदास ने इस मानव को ”ढीठ तारक“ नामक अमंगल सूचक महादैत्य धूमकेतु तारे के समान विश्व संकट के लिए उठा हुआ कहा था। (कुमार संभव-21/32) कुमार संभव के एक तारकासुर से ऋषि चिन्तित थे। आज हर नेता, हर इंजीनियर, हर डॉक्टर, हर धनी, हर कम्पनी विभाग प्रमुख तारकासुर है।
पर्यावरण
    प्रकृति द्वारा निर्मित वह क्षेत्र जिसमें पृथ्वी के जल, थल एवं वायुमंडल आते हैं पर्यावरण है। पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है जिसमें संपूर्ण घेर रखा हो। मार्शल जोन्स के अनुसार- ”पर्यावरण एक व्यक्ति या समूह का कुछ घेराव है“ शंस के अनुसार- "पर्यावरण हमें प्रगति देने वाली बाहरी शक्ति है“ के.जे.मांकहाउस पर्यावरण को और व्यापक करते उसकी परिभाषा इस प्रकार देते हैं- ”आस-पास ऊपर-नीचे की संपूर्ण बाह्य स्थितियों का योग जिसमें एक प्राणी या समस्त या वस्तु स्थित है पर्यावरण है।" वेस्टर के शब्दकोष में पर्यावरण की परिभाषा इस प्रकार दी गई है ”मानव जीवन या समूह जीवन को प्रभावित करने वाले संपूर्ण तत्वों की जो सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां (यथा रीति-रिवाज, कानून, भाषा, धर्म, अर्थ तथा राजनीतिक संस्थान) हैं। उनकों प्रभावित या परिवर्तित करने वाली चारों ओर की स्थितियां या प्रभाव या शक्तियां पर्यावरण के रूप में संदर्भित की जा सकती हैं।“
    पर्यावरण विज्ञान आधुनिक विज्ञान माना जाता है। उपरोक्त परिभाषाएं आधुनिक चिन्तकों द्वारा दी गई हैं। ये परिभाषाएं पर्याप्त पूर्ण हैं। संस्कृत साहित्य में भी पर्यावरण के पर्याप्त संदर्भ है, जिनमें पर्यावरण की ओर इंगन है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ वेद में पर्यावरण परिभाषा इस प्रकार दी गई है "द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ँ् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।। शान्तिः शान्तिः शान्तिः" (यजु. 36/17) यह यजुर्वेद मंत्र पर्यावरण की पूर्ण परिभाषा है।
    इस मंत्र का अर्थ इस प्रकार है-1. द्यौ (समस्त प्रकाशयुक्त पदार्थों) में जो प्राकृतिक शान्ति (व्यवस्था, संतुलन, स्थैर्य) है वह मुझे सहज प्राप्त हो। 2. अंतरिक्ष की प्राकृतिक शांति मुझे प्राप्त हो। 3. पृथ्वी (वसुन्धरा=आधार तल जो सुरक्षित हो) में जो प्राकृतिक शांति है वह मुझे प्राप्त हो। 4. आपः (प्रवहणशील=जल, प्राण, वायु) की प्राकृतिक शांति मुझे प्राप्त हो। 5. औषधियों (सोमलता, अमरलता, बूटियां आदि) में जो प्राकृतिक शमन उन्नयन शांति है वह मुझे प्राप्त हो। 6. वनस्पतियों में जो प्राकृतिक शांति है वह मुझे सहज प्राप्त हो। 7. विद्वद्गण में जो सौम्य शांति है वह मुझे सहज प्राप्त हो। ऋजु पथ शांति मुझे प्राप्त हो। 8. ब्रह्म (परमात्मा या ज्ञान) में जो आल्हाद है वह मुझे प्राप्त हो। 9. संपूर्ण सामंजस्य में जो प्राकृतिक शांति है वह मुझे प्राप्त हो। 10. शांति में जो नैसर्गिक आधारभूत सरलता है वह मुझे प्राप्त हो। युद्ध से शांति प्राप्त न हो, न कोई इसका प्रयास करे। 11. प्राकृतिक शांति सबको सम प्राप्त हो। 12. आधिभौतिक शांति मुझे प्राप्त हो। 13. आधिदैविक शांति मुझे प्राप्त हो।
14. आध्यात्मिक शांति मुझे प्राप्त हो।
"कारु"-पर्यावरण
    चौदह तत्वीय पर्यावरण संतुलन या र्स्थर्य वैदिक मानव को अभीष्ट है। उपरोक्त मंत्र का ऋषि है ”द्यौरित्यस्य दध्यङ् आथर्वणः“ द्युतिमय सर्वव्यापक ऋतु में ध्यानयोग सर्वोच्चावस्था द्वारा निमग्न समस्त इन्द्रियाथर्वणों से पूर्ण उन्मुक्त। उपरोक्त पर्यावरण मंत्र का शत-प्रतिशत अर्थ ‘‘द्यौरित्यस्य दध्यङ् आथर्वण’’ स्थिति प्राप्त सम्यक् कर सकता है। वैसे हमें जो अर्थ भान होता है उससे वैदिक काल में पर्यावरण पर चिन्तन उसकी शुद्धि एवं उसकी मानव हेतु उपादेयता का स्तर आधुनिक युग से उच्च था यही सिद्ध होता है।
    वेद सम्यक् मानव उन्नति का पथ दर्शाते हैं। यज्ञ समन्वित विज्ञान द्वारा मानव उन्नति संस्कृति साहित्य को अभीष्ट है। शिल्पकार या वैज्ञानिकों के लिए उस समय ‘‘कारु’’ शब्द प्रयुक्त होता था। कारु के कुछ गुण हैं दैव्या = दक्षों में कुशल, प्रथमा = प्रसिद्ध, होतारा = कल्याणमय दानशील, सुवाचा = प्रशंसित वाणीमय, भिमाना = ऋतु   विधान निर्माता, प्रचोदयन्ता = सद्विज्ञान प्रेरक, प्रदिशा = वेद के प्रमाण सना, कारु = अध्येता और प्रणेता (कर्म कुशल वचन कुशल) ऐसे कारु को यज्ञमय शिल्प विज्ञान साधना करनी चाहिए तथा उसका उपदेश देना चाहिए।
    दैव्या प्रथमा सुवाचा भिमना यज्ञ मानुषो यजद्वै।
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारु प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता।
    शिल्प विद्या के प्रकाशमय यज्ञ का ग्रहण वर्धक, सुखकारी, बढ़ा हुआ (तूयम्, स्योनम् बर्हिः) शल्पिविद्या धारण कर्ता, क्रिया, सुशिक्षित मधुर वाणी तथा विज्ञान मयी वृद्धि (भारती, इडा एवं सरस्वती) से जो आपूर्त हो, मनुष्यवत हो (सर्व हितकर हो) वह ऐसा जानते हुए सुकर्मा सुक्रतु हमको उत्तम प्रकार से (स्वपसः आ सदन्तु) तीन देवियां प्राप्त कराएं।
    संस्कृति युग में द्यौ, अन्तरिक्ष, धरा आपः वनस्पति आदि से युक्त पर्यावरण, इससे समन्वित शिल्पकार एवं यज्ञमय शिल्प तथा भारती, इडा, सरस्वती, बुद्धि द्वारा संप्रेषित तथा प्रजा ग्रहणीत उत्तम दायक उत्तम विज्ञान सर्वे भवन्तु सुखिनः भावना से ओतः प्रोत है।
वैदिक पर्यावरण यज्ञ विद्या
    संस्कृत साहित्य के पर्यावरणादर्श से मानव कितना भटक गया है। ”ऋजीते परि वृङ्धिनः“ सरल व्यवहार में चहूं ओर से हमारे शरीर से रोगों को (रोग वातयान से) पृथक कीजिए। आज मानव को ऋजु पंथ की सर्वाधिक आवश्यकता है। यजुर्वेद में धरा को सूक्ष्म, शिवा, स्योना, सुषदा, उर्जस्वती, तथा पयस्वती कहा गया है। ऋग्वेद में इसे सूत्रामाणम, अनेहसम्, सुशर्माणम्, सुप्रणीतम, द्याम, स्वरित्राम्, अदितिम्, अवन्तीम् और दैवीय, अन्तरिक्ष नाव कहा गया है। ये समस्त शांति, स्वस्थता, दिव्यता, आनन्द हेतु निवास की दिव्य संज्ञाएं हैं। इनके अर्थ हैं यह धरा सुरक्षा साधन युक्त, विस्तृत उपद्रव रहित, आनंद दात्री, सु-निर्मित, दीप्तिमय, सुचलित, निर्दोष, सुस्थिर, अछिद्रित, दैवीय अंतरिक्ष यान है। इस पर हम सब स्व-कल्याणमय आरोहण करें।
    इस धरा पर दो व्यवस्थाएं हैं। एक ब्रह्म कृत या ऋत या प्राकृतिक दोष मानव कृत या अर्धऋत या सप्रयासिक। प्राकृतिक व्यवस्था स्व संतुलित है पर मानव कृत अवस्था असंतुलित है। इस असंतुलन का निवारण भी मनुष्य को ही करना है। आधुनिक औद्योगिक प्रगतिशील मनुष्य ने स्वकृत असंतुलन के निवारण का कार्य प्रकृति पर छोड़ दिया था परिणामतः नदी, सागर, आकाश, धरा, प्रदूषित होते चले गए। आज मानव अपने द्वारा उत्पन्न असंतुलन पर चिंतित हो उठा है और प्रकृति में स्वंय पैदा की गई असंगति का निवारक स्वंय है तथा इस निवारण का साधन है यज्ञ।
    यज्ञ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘यज्’’ धातु से होती है। यज्ञ अर्थात् देवपूजा, संगति करंण, दानेषु अर्थात् आदर सम्मान, संगठन एवं परोपकार हैं। व्यापक रूप से यज्ञ के यथार्थ स्वरूप में ज्ञान विकास, समाज के प्रति कर्त्तव्य तथा प्रर्यावरण प्रदूषण निवारण सम्मिलित माने गए हैं।
    यज्ञ का एक चरण है पर्यावरण शुद्धि। पूर्व मीमांसा के अनुसार द्रव्य, उनका संस्कार, तथा उनका यथायोग्य उपयोग यज्ञ कर्ता के लिए आवश्यक है। द्रव्य चार प्रकार के हैं जो होम में प्रयुक्त होते हैं। एक सुगन्ध गुण युक्त, दूसरा मिष्टगुणयुक्त तीसरा पुष्टिगुणयुक्त तथा चौथा रोगनाशकगुणयुक्त। इन चारों का परस्पर शोधन, संस्कार, मिश्रण तथा अग्नि में युक्तिपूर्वक जो होम किया जाता है वह वायु और वृष्टि जल की शुद्धि करने वाला होता है।
    यज्ञ विज्ञान का स्वरूप शथपथ ब्राह्मण में इस प्रकार दिया गया है। "अग्निर्वै धूमो जायते धूमाद् आभ्र आभ्राद् वृष्टिरग्नयः एता जायन्ते तस्मादाह तपोजा इति"
    ‘‘जो होम करने के द्रव्य अग्नि में डाले जाते हैं उनसे धूम (अग्निवत् सूचक) उत्पन्न होते हैं। अग्नि की प्रकृति ही पदार्थों को सूक्ष्म विभक्त कारना है तथा हल्के होने के कारण इनका आकाश मंे विस्तरण होता है- इसमें जलांश ‘‘भाफ’’ है पृथ्वी अंश ‘‘शुष्क’’ है। सम्मिश्र को ‘‘धूम’’ कहते हैं। धूम मेघ मंडल में वायु आधार से रहा है ये मिलकर बादल बनाते हैं। बादल से वृष्टि, वृष्टि से औषधि, औषधियों से अन्न, अन्न से धातु, धातुओं से शरीर और शरीर से कर्म बनता है।
    तैत्तिरीय उपनिषद आनंदवल्ली के प्रथम अनुवाद में यह योजना यध्यात्म यज्ञ के रूप में दी गई है- "तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः, संभूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः, पृथ्वी, पृथिव्या औषधयः, औषधिभ्योऽन्नं, अन्नाद्रेत, रेतसः पुरुषः,  स वा एषः पुरुषोऽन्न-रसमयः"
    इस यज्ञ का संचालक  "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" है जो हृदयकाश में निहित है। "ब्रह्म हि यज्ञः"। अतः ब्रह्म से आकाश, आकाश से वायु से अग्नि से जल से पृथ्वी से औषधि से अन्न से वीर्य से पुरुष उत्पत्ति क्रम है। पुरुष निश्चय ही अन्न रस मय है।
    वैदिक दृष्टिकोण एक व्यापक समन्वय योजना है मानव पर्यावरण में अटूट संबंध है। होम से आकाश, वायु, जल, औषधि, अन्न शुद्ध होते हैं। अतः अन्न रसमय मनुष्य भी शुद्ध होता है। संस्कृत साहित्य में इस शुद्धि की योजना के सूत्र फैले हैं- ”यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म। यज्ञो वै भुज्युः। यज्ञो भगः। यज्ञो वै महिमा। यज्ञो वै सुम्नम्ं“
    न केवल वेद वरन् ब्राह्मणों में भी यही सूत्र वितान है-  "अध्वरो वै यज्ञः। यज्ञो वै विशः यज्ञे ही सर्वाणि भूतानि विशन्ति। यज्ञो वै भुवन ज्येष्ठः। यज्ञो वा अवति।"
    ब्रह्म यज्ञ है। यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। यज्ञ अन्नदाता है। यज्ञ ऐश्वर्य-दाता है। यज्ञ महिमा वृद्धिकर है। यज्ञ ही सुख है।
    यज्ञ अहिंसा की विद्या है। "भैषज्ययज्ञा वा एते। तस्मादृतु सन्धिषु प्रयुज्यन्ते। ऋतु सन्धिषु वै व्याधिर्जायते।" ऋतु संधि काल में व्याधियां होती हैं अतः उस काल व्याधिमुक्ति हेतु औषधियों से यज्ञ किए जाते हैं। इस यज्ञ विज्ञान का ज्ञाता ”ऋत्विक्“ संस्कृत साहित्य का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक है। "ऋतां येजते, स ऋत्विजः।" जिस जिस ऋतु में जैसा-जैसा करना चाहिए वैसा जो यथा योग्य रीति जानता है तथा करता है वह ऋत्विक् है।
    "यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्" सृष्टि यज्ञ का ऋत्विक् ब्रह्म है। "शांति वनस्पतयः" हरी भरी वसुन्धरा के पोधे, पेड़ लताएं उनके पुष्पादि की सुगन्ध तथा उनसे उत्सर्जित औषजन या प्राणवायु सृष्टि शुद्धि यज्ञ की धूम है। ब्रह्म ऋत्विक् ने ऋत् प्राकृतिक परिशुद्धि व्यवस्था रची है। प्राकृतिक रूप से हुई शुद्धि मानव के लिए मध्यम है प्राणी मात्र के लिए यह शुद्धि उत्तम कर सकता है। वातायन को उत्तम करना "ऋत्विक्" का दायित्व है। आज ऋत्विक् का तथाकथित पर्याय ”वैज्ञानिक“ है। इस युग में वैज्ञानिक ही प्राकृतिक मध्यम वातायन को निम्न कर रहे हैं।
यज्ञविज्ञान
    यज्ञ शुद्धि प्रसारण विद्या है। ऋग्वेद 10/16/11 में ऋतावृध (सृष्टि नियम ज्ञाता तथा नियमानुसार अग्निवत शुद्धि फैलाता वैज्ञानिक) को "कव्यवाहन" तथा "हव्यवाहन" अग्नि के स्वरूप को निश्चय से बताता कहा गया है। कव्यवाहन महान विधाएं हैं। इनका सार रूप ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के प्रथम अष्टक के प्रथम मन्त्र में दिया गया है।
    कव्य शब्द कवि से बना है "कवि" ब्रह्म की संज्ञा है। ”कव्यवाहन“ यज्ञ का अर्थ है जिस यज्ञ से ब्रह्म गुणों का वाहन हो। हर अक्षर (अ-नष्ट त्र न-नष्ट) में देवता समाविष्ट है। हर शब्द भी अक्षरों से निर्मित होने के कारण देवमय तथा अमर है। मंत्र एक भावलय में कई दिव्य गुणों के वाहक हैं। ”कव्य वाहन“ मानस शुद्धि प्रसारण है एवं ”हव्य-वाहन“ वातायन शुद्धि प्रसारण है। अथर्ववेद 3/15/3 में दिव्य बुद्धि साधक संज्ञान वन्दना करता समृद्धि वेग, शक्ति के लिए धृतमय हव्य (यज्ञ हव्य) से अग्निहोत्र कर्ता है। इस प्रकार या मानसशुद्धि एवं पर्यावरण शुद्धि का प्रसरण करते हैं।
सम्यक् असम्यक्
    पर्यावरण के प्रमुख तत्व हैं धरा, अंतरिक्ष, वायु, जल, वनस्पतियां। आज विश्व में इनको संस्कारित करने की कोई सर्वांगणीय योजना जो इन्हें तथा सीधे मानव को जोड़ती ही नहीं है। "सम्" उपसर्ग पूर्वक "कृ" धातु से भूषण अर्थ में सुट् का आगम करके "क्तिन्" प्रत्यय करने से "संस्कृति" शब्द बनता है इसका अर्थ है भूषण भूत सम्यक् कृति। संस्कार का अर्थ है भूषण भूत सम्यक् करण। पर्यावरण (धरा, अंतरिक्ष, वायु, जल वनस्पतियों आदि) को संस्कारित करने का अर्थ यह है कि इन्हें मानव हेतु भूषण भूत सम्यक् याने उपयोगी किया जाए। पशु, पक्षी कीट, पतंगादि सम्यक् असम्यक् नहीं समझते वे स्वाभाविक जीते हैं। मानव सम्यक् असम्यक् चेष्टाओं को करता है।
    पर्यावरण के विषय में आधुनिक तथा वैदिक मानव की क्रियाओं या चेष्टाओं की तुलना रोचक है। आधुनिक आर्थिक मानव विष विकास द्वारा शुद्धि प्रयास करता है। कछुआ अगरबत्ती, मच्छर भगाओ टिकिया, ओडोनील, रासायनिक एक्सपेलर स्प्रेयर, कीटनाशकादि इसके प्रमाण हैं। मानव व कीट दोनों के लिए वे विष हानिकर हैं। मानव जीवन की योजनाएं फ्रिज, टी.वी. स्कूटर, कार, वायुयान, कारखानादि प्रदूषण आधारित हैं। संपूर्ण चेष्टा ही वातायन के लिए असम्यक् है। आधुनिक औद्योगिक मानव पर्यावरण को असंस्कारित कर रहा है। उसकी चेष्टाएं असम्यक् हैं। अपने आपको विज्ञान भक्त कहने वाले मानव के पास जीवन निर्माण, समाज निर्माण, पर्यावरण निर्माण की कोई व्यापक योजना नहीं है। यह मानव बर्थ-डे-पार्टियों, कुछ पदोन्नति-पार्टियों, सेवानिवृत्ति-पार्टियों आदि के रूप में अपूर्ण सी सामाजिकता जीता है। इसके जीवन में जन्म, विवाह तथा मरण के अधकचरे रूप रह गए संस्कार ही बाकी रह गए हैं। कहीं-कहीं पर इनमें होम किया जाता है। मानव के अतिरिक्त सारे प्राणी स्वाभाविक जीवन जीते हैं। वे असम्यक् नहीं जीते हैं।
    आधुनिक आर्थिक प्रौद्योगिक मानव जीवन प्रारूप की तुलना में वैदिक मानव का प्रारूप त्रयी विद्या (ज्ञान, कर्म, उपासना,-चारो वेद) आधारित पांच कोषमय अस्तित्व के उन्नयन हेतु तीन ऋणों से उऋण होने के उद्देश्य से छत्तीस जीवन अनुशासनों से आबद्ध पूर्णतः वैज्ञानिक है।
    ये छत्तीस अनुशासन हैं अ) चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष; ब) चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शिल्पकार; स) चार आश्रम- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास; द) सोलह संस्कार- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्कमण, अन्नप्राशन, चूड़ा-कर्म, कर्ण-वेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास; इ) पांच यज्ञ- (दैनिक)- ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, बलिवैश्देव यज्ञ, अतिथि यज्ञ।
    इनके सिवाय नैमित्तिक यज्ञ हैं जो ऋतु संधियों आदि पर किए जाते हैं- फ) त्रिसंध्याः- प्रातः, मध्यान्ह, सायं।
    दैनिक होम के अतिरिक्त हर संस्कार पर तथा नैमित्तिक   संधि पर होम किया जाना पर्यावरण शुद्धि हेतु है जिसे हर मानव के जीवन में ही प्रत्योरोपित किया गया है।
हव्य वाहन
    होम यज्ञ का भौतिक रूप है। यह हव्यवाहन रूप है। यजुर्वेद  के प्रथम मन्त्र में यह विवरण इस प्रकार है- अन्नादि की प्राप्ति के लिए उत्तम औषधियों के रसों की उपलब्धियों के निमित्त जगत् उत्पत्ति हेतु सेवन करने योग्य अग्नि का हम सेवन करते हैं। (अग्नि में उत्तम रीति से डाली हुई आहुति आदित्यमंडल तक जाती है। आदित्य से वृष्टि होती है- उससे अन्न, अन्न से प्रजाएं उत्पन्न होती हैं। तथा अग्नि ही संसार में सब औषध वनस्पत्यादि का उत्पादक है। इसके बिना संसार में कुछ उत्पन्न नहीं होता (गोपथ तथा जैमिन्युपनिषद ब्राह्मण में ”अग्नि“ को ”सविता“ कहा गया है)।
    जगत में सब उत्पत्ति का निमित्त दिव्य गुण युक्त सविता अग्नि सब क्रियाओं को प्राप्त कराने वाले वायु आदिकों को श्रेष्ठ कर्मरूप यज्ञ के लिए प्रेरित करता है। (यज्ञ में हुत द्रव्य को वायु सर्वत्र पहुंचा देता है, जिससे सबको सुख होता हैं) वरुण वायु- अपामाधिपतिः अर्थात् जलों का स्वामी है। इस प्रकार यज्ञ, वातायन में शुद्धि प्रसारण, पौष्टिकता प्रसारण, औषध प्रसारण की विद्या है। वसु शब्द का अर्थ यज्ञ, निवास तथा आच्छादन है। वसोः पवित्रमसि द्योरसि पृथिव्यसि मातरिश्वनो, घर्माेऽसि     विश्वधाऽसि परमेण धाम्ना दृ ँ्हस्व मा ह्नार्मा ते यज्ञपतिर्ह्नार्षीत्।
    हे विद्यारत मनुष्य तू जो यज्ञ शुद्धि का हेतु है जो विज्ञान के प्रकाश का हेतु और सूर्य की किरणों में स्थिर होने वाला है। जो वायु के साथ दूर-दूर तक फैलने वाला है। जो वायु को शुद्ध करने वाला है। जो संसार का धारण करने वाला है तथा जो उत्तम स्थान से सुख का बढ़ाने वाला है, उस यज्ञ का मत त्याग कर तथा यज्ञपति भी यज्ञ का त्याग न करे।
    यज्ञ वायु, धरा, अन्तरिक्ष, द्यौ, वनस्पतियों आदि को संस्कारित करता है। वेद में स्थान-स्थान पर यज्ञ संस्कारित वर्षा की कामना की गई है। ”दिव्या वृष्टिः सयताम्“ दिव्य गुण युक्त वर्षा हमें प्राप्त हो। आज जब ”एसिड वर्षण, धूलिमय वर्षण, काली वर्षा से मानव त्रस्त होता है।“ अभ्यावर्तस्व पृथ्वी यज्ञेन पयसा सह ”पृथ्वी को यज्ञ के दुग्धवत जल से चारों ओर आवृत कर दो।“ वर्षा ते अग्निरिषितो अरोहत् अग्नि उद्यत-समर्थ है इसकी मदद से हम यज्ञ के जल को भावित करके पृथ्वी को आप्लावित कर दें। यज्ञ भावना पवित्र तथा उदात्त है।
    ”वृष्टिश्च मे यज्ञेन कल्पताम्“ अर्थात् हमारी वृष्टि, मेघों, की वर्षण क्रिया, यज्ञ के द्वारा सम्पन्न हो। यज्ञ हमारे नियंत्रण में होने के कारण वर्षा भी हमारे नियंत्रण में हो अर्थात् ”निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु“ जब-जब हम कामना करें तब-तब मेघ वर्षा करें। अतिवर्षा, अनावृष्टि से हमारा बचाव हमारे हाथ हो।
    संस्कारित वातावरण आज सर्वाधिक दुर्लभ है। आज के वैज्ञाानिक दृष्टिकोण जो सुविधा भोगी, सीमित, दृष्टि, आवेगों के रूप में सुखकरादि है विश्व मानव के साथ एक साजिश है। यह साजिश इतनी खतरनाक है कि अन्न को कीटों से रक्षित किया जा सके। सारे विश्व के वैज्ञानिक प्रयासों में एक भी बीज या अन्न संरक्षक ऐसा विकसित नहीं हुआ है। जो मानव हेतु हितकर हो या इकोलॉजी को असंतुलित न करता हो। मात्र एक यज्ञ विद्या इसका अपवाद है। अमेरिका में किए गए कुछ प्रयोग दर्शाते हैं कि मात्र चावल की आहुति से वातावरण में शुद्धि हुई। इस ओर और प्रयोग करने की आवश्यकता है। इसमें संदेह नहीं है कि यज्ञ से वातावरण सौम्य सुवासमय हो जाता है तथा यह सुवास भली लगती है।
कचरा द्वीप
    सन् 1952 में विश्व की कुल जनता का 29 प्रतिशत नगरों में रहता था। सन् 1975 में 39 प्रतिशत तथा सन् 2000 में विश्व के करीब 50 प्रतिशत निवासी नगरों में रहने लगेंगे। नगर में ग्राम की अपेक्षा प्रदूषण की अधिकता होती है। शोर गुल, गर्मी, धूल, विषाक्त पदार्थ, कार्बन द्वि ओषिद, कचरा आदि के क्षेत्रें में शहरों में प्रदूषण कहीं अधिक है। धरा की दृष्टि से शहर धरा पर कचरा द्वीप की तरह होते हैं। ये कचरा द्वीप जीवन्त होने के कारण तेजी से और अधिक प्रदूषण की ओर बदलते हैं। शहरों में गांवों की तुलना में ताप मात्रा में कमी अधिकता 0.50 से 1.00 सें.ग्रे. अधिक, सापेक्ष आर्द्रता 6 प्रतिशत कम, धुलकण दस गुना अधिक, शीतकालीन कुहरा शत-प्रतिशत अधिक सूर्य विकरण 16-20 प्रतिशत कम, वायु गति 20-30  प्रतिशत कम तथा अवक्षेपण 5 से 10 प्रतिशत अधिक होता है। नगरों में इनके सिवाय वर्षा जल का पी.एच.सामान्य से कम होता है। शोर एवं गंध प्रदूषण भी होता है।
    शोर, गंध, वातायन, ताप, अन्न, प्रदूषण के साथ नगरों में जल प्रदूषण की स्थिति भी भयावह है। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार विकासशील देशों की 53 प्रतिशत नागरीय जनता को सामान्य मल एवं दूषित जल के निस्तारण की सामान्य व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं है। भारत  के 3119 नगरों व कस्बों में से केवल 207 के पास आंशिक तथा 8 के पास पूर्ण दूषित जल प्रवाह तथा निस्तरण प्रणाली है। भारतीय जन संख्या का 66 प्रतिशत भाग प्रदूषित जल के उपभोग के कारण रोग ग्रस्त रहता है। गंगा नदी में प्रतिदिन 20704 लाख लीटर दूषित जल लीटर दूषित जल प्रतिदिवस छोड़ा जाता है। भारत की प्रमुख 14 नदियों (गंगा, ब्रह्मपुत्रा, स्वर्ण रेखा, ब्राह्मणी, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, नर्मदा, माही, साबरमती, सिन्धु पैन्नार) में प्रतिदिन 37736 लाख लीटर प्रदूषित जल छोडा जाता है। गंगा जल में सत्रह धातु अवशेष हैं इनमें से पंद्रह स्वास्थ्य के लिए हानिकर हैं। इस प्रकार भारतीय तथा विश्व के नगरों की प्रदूषण समस्याएं अत्यंत जटिल हैं।
    सन् 2000 तक विश्व को ओजोन परत ह्रास, धरा, ताप, वृद्धि की महत समस्याओं के साथ पचास प्रतिशत नगरीय आबादी के प्रदूषण ग्रस्त होने की समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा।
    क्या विश्व की विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के पास इस समस्या को सुलझाने को कोई पथ है? क्या इन संस्थाओं के पास इतने संसाधन हैं कि वे इन समस्याओं का निराकरण कर सकें? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर हैं नहीं।
समस्या निदान
    वैदिक दर्शन इस समस्या का निदान जानता है। वैदिक दर्शन में संस्कारित जल, वायु, द्यौ, अंतरिक्ष की कई संकल्पनाएं हैं। एक संकल्पना इस प्रकार है।
    मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः।।1।। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिव ँ्रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।।2।। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः।।2।।
    हम सबके लिए वायु मधुमय ऋतु के समान बहते हैं। नदियां एवं सिन्धु मधुमय प्रवाहित हैं। औषधियां भी मधुमय हों।
    हम सबके लिए रात्रि मधुमय, प्रातः से लेकर दिवस मधुमय, धरा के द्वयणुक त्रसरेणु आदि मधुमय और ज्योति भी मधुमय हो ब्रह्म हमारा रक्षक हो।
    हमारे लिए वनस्पति मधुमय, सूर्य मधुमय हो हमारे लिए गाय के समान मधुर गुण वाली किरणें हों।
    न केवल यह संकल्पना वरन् वैदिक शांति पाठ का मंत्र जिसका विनियोग हर यज्ञ और धार्मिक कार्यक्रम के अन्त में है वह हर मानव के अंतस में अध्यारोपित कर मानव को पर्यावरण के प्रति सतत् जागरुक रखना भी वैदक ज्ञान की विशिष्टता है।
    पर्यावरण को संपूर्णता से देखना आज की वैज्ञानिक युग की आवश्यकता हैं पर्यावरण की वैदिक संकल्पनाएं आज भी नूतन है।
    डॉ.बी.बी.सुन्दरेशन उत्तम गुणवत्तामय जिन्दगी की ओर इंगन करते लिखते हैं ”उत्तम गुणवत्ता की जिन्दगी का अर्थ है समाज में नागरिकों को शुद्ध हवा, शुद्ध जल, स्वच्छता, उत्तम निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की देख-भाल, सौन्दर्य पूर्ण आस-पास तथा वह पर्यावरण जिसमें कला और साहित्य पुष्पित हो का ढांचा देना। डॉ.सुन्दरेशन स्वास्थ्य उत्तम पर्यावरण के तत्व (अ) शुद्ध हवा (ब) शुद्ध जल (स) उत्तम निवास (द) स्वास्थ्य एवं शिक्षा, (इ) सुआस-पास, (फ) कला एवं साहित्य पुष्पित होने वाला वातावरण तथा (य) स्वच्छता है। ये तत्व वैदिक पर्यावरण परिभाषा के चौदह तत्वों में से मात्र कुछ अंतरिक्ष, धरा, औषधयः, द्यौ, आपः, तथा आधिदैविक भर को स्पर्श करते हैं।
    डॉ.सुन्दरेशन की भावना है कि जो तरीके या विधियां हम जी रहे हैं उन तरीकों या विधियों से हमें साफ बच निकालना होगा तथा अपने सोचने की दिशा का पुनर्निर्धारण करना होगा कि पर्यावरण संबंधी विषय आयोजन की प्रथमावस्था में ही महत्वपूर्ण हो। अप्रत्यक्षः वे वेद की ओर ही लौटने की बात कर रहे हैं। वेद कहता है-
पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मानवो धिया।
पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातुमा।।
पवनामः पुनातु मा क्रत्वे दक्षाय जीवसे।
अथो अरिष्टातये।।
    बुद्धि द्वारा मुझे देवजन पवित्र करें, मननशील मानव पवित्र करें। मुझे समस्त भूत पवित्र करें परम पवित्र मुझे पवित्र करें। परम पवित्र से मैं पवित्र होऊं- (अ) क्रतु के लिए- (1) कर्म, (2) शुभकर्म, (3) श्रेष्ठतम कर्म, (4) यज्ञ, (5) शुभ कर्म कर्ता होने के लिए; (ब) दक्ष के लिए- (1) वृद्धि, (2) क्षिप्रता; (3) बल के लिए, (स) जीवन के लिए- (1) उत्साह, (2) स्फूर्ति, (3) सदाचार, (4) उर्ध्वोन्मुख होने के लिए, (द) अरिष्ट के लिए- (1) अहिंसा, (2) न्याय के लिए। मानव का क्रतु, दक्ष, जीवसमय तथा उर्ध्वोन्मुख होने के लिए पवित्रता की आकांक्षा करना उसके सोचने की दिशा का निर्धारण करना है। प्रति दिवस पांच यज्ञ मय मानव सुविचार वाहक (काव्य वाहक) तथा सुवातायन वाहन (हव्य-वाहक) जीवन का धारक है।
    इस प्रकार विश्व पर्यावरण और मानव समृद्धि की दो अवधारणाएं हें एक वर्तमान, द्वितीय वैदिक, वत्रमान अवधारणा नकारात्मक तत्वों विष द्वारा संरक्षक, प्रदूषण वर्धक, सीमित दृष्टिकोण युक्त, दूरदृष्टि रहित, क्षेत्र विशेषाधारित है। वैदिक अवधारणा विशिष्ठ उद्देश्य पूर्ण, प्रदूषण निवारक, सर्वागणीय दृष्टि युक्त, औषध द्वारा संरक्षक है। वैदिक अवधारणा प्रचीन होते हुए भी इस युग के भविष्य के लिए आज की आवश्यकता है।                 
स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (म.प्र.) दूरभाष(0788) 2392884